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Monday, August 31, 2009

बड़ा खराब टाइम आ गया

जमाना बहुत खराब गया। पिछले कई जमाने से यही बात चली रही है। जमाना, वक्त, समय दुनियां, स्थितिबस शब्द अलग हो सकता है भाव हमेशा से यही रहा है-बहुत बुरा समय गया भाई। जब मनुष्य जाति के पासभाषा नहीं थी तब वो मुँह बिचका कर, नाक सिकौड़ कर, भौहों को तिरछा कर, हाथ के इशारे से झुंझला कर इसीसंवाद को अभिव्यक्त करता रहा होगा।

त्रेता युग में जब कैकेयी के कहने पर राम जी को चौदह वर्ष का बनवास मिला तब भी आम लोगों में यही संवाद चलाहोगा-

'समय बहुत ही बुरा गया'
रथ दशरथ जी का फंसा और गति हमारी रोक दी।
वर कैकेयी का मिला, अभिशप्त हम हो गये'

उस समय के विरोधियों ने तो यहाँ तक कहा होगा-
'अजी ये भारत भी बहुत चतुर है। राज करने के नाम पर राम जी के खड़ाऊँ तक मांग लाया, अब घूमो राम जी चौदह वर्ष तक नंगे पाँव, जंगलों में।

द्वापर युग में तो ये संवाद अनेक बार बोला सुना गया होगा। शांतनु के कारण भीष्म प्रतिज्ञा पर कंस के अत्याचार केकारण, शकुनी के छल पर धृतराष्ट्र के पुत्र-मोह के कारण, कर्ण पर हुए अन्याय पर दुर्योधन-दु:शासन के भीतर फैलरही घृणा और जाने कितने कारणों से यही संवाद बात प्रारम्भ करने के लिए निकला होगा। इस संवाद की अतितो द्रोपदी के चीर-हरण पर हुई होगी-

'हे ईश्वर इतना बुरा समय भी हमें ही दिखाना था।'

'भला पत्नी को भी दाँव पर लगाया जाता है।

'राज भवन में जुआ खेला जा रहा है…

'भीष्म, द्रोणाचार्य, विदुर देखते रहे और भरी सभा में द्रोपदी का चीर - हरण किया गया हे ईश्वर इतना बुरा समयकिसी को दिखाये।

ये तो तब था जब ईश्वर स्वयं पृथ्वी पर मानव-रुप में थे। अब क्या हालात हो गये आप अपने -आप से ही पूछ सकतेहैं?

जैसा कि सबके पिता कहते हैं, कल मेरे पिता ने भी मुझसे हजारवीं बार कहा-'बेटा जमाना बहुत खराब गया हैअब तो बस सामने वाले की हाँ में हाँ मिलाये जाओ तब ही जी सकते हो।' मैने सोचा एक दिन तो उनकी बात भीमान कर देखो। उसी दिन मुझे एक नेताजी के घर किसी काम से जाना था। वहाँ पहुँच कर मैंने नेता जी की प्रशस्तीमें दो-चार संवाद कहे ही थे कि नेता जी विनम्रता की प्रतिभूति हो गये-

अजी! मैं क्या हूँआप लोगों का सेवक, आप जनता जनार्दन के चरणों की धूल हूँ मैने पिता की बात याद करतेहुए कह दिया - हाँ, वो तो हो।'

बस इतना सुनते ही नेता जी बिफर गये और उनके पास उस समय जितने किस्म के चमचे गुंडे और कुत्ते थे सबमुझपे छोड़ दिये।

क्यों गया बहुत खराब जमाना। अब तो हाँ में हाँ मिलाने का भी जमाना नहीं है। बहुत खराब टैम गया है।

Wednesday, August 26, 2009

जसवन्त जिन्ना और विभाजन















एक थे जसवन्त सिंह। पिछले तीस वर्षो से भारतीय जनता पार्टी में थे। भाजपा वालों ने सोचा कि इन्हें पार्टी से धक्का दिया जाए। ये धक्का वो दिल्ली में भी दे सकते थे, फिर सोचा जसवन्त भूतपूर्व सैनिक हैं दिल्ली में धक्का दिया तो उठ कर सम्भल सकते हैं। ऊँचाई से धक्का दिया जाये इसलिए शिमला ले जा कर काम को अंजाम दिया गया। पता था सम्भलना तो दूर उठना भी असम्भव है। ऐसा नहीं कि जसवन्त ने समझौते की कोशिश नहीं करी होगी लेकिन भाजपा का काग्रेंस से वैचारिक ही नहीं भौगोलिक मतभेद भी है। जिस काग्रेंस ने कभी शिमला में समझौते किये हो वहाँ भाजपा कैसे समझौता कर सकती थी। लब्बोलुआब ये कि भाजपा वाले शिमला में चिंतन शिविर की बैठक में गये और जसवन्त की बैठक में बैठ कर आ गये।

ऐसा नहीं कि चिंतन शिविर में चिंतन हुआ ही नहीं। कई भाजपा नेताओं ने सचमुच चिंतन किया और हार के लिए स्वयं को दोषी मान आत्म - हत्या का निर्णय लिया। एक वरिष्ठ भाजपाई ने उन्हें ज्ञान दिया-कुछ रचनात्मक कार्य करो, किताब लिखो, लेखक भी कहलाओगे और आत्म-हत्या भी हो जायेगी।
दरअसल भाजपा का हर नेता अटल बिहारी बाजपेयी बनना चाहता है । पर अटल जी पहले लेखक थे बाद में राजनीति में आये और ये राजनीति में इतने साल पक कर लेखक बनने चले। भई जिसका काम उसी को साधे।

'किताब लिखना आसान नहीं, पूछो जसवंत कलमकार से,
ये कागज को काट रहे हैं, जग लगी तलवार से।


जसवन्त सिंह को किताब लिखने का शौक है। उनकी दो हजार छ: में लिखी पुस्तक भी विवादों में रही। ये शौक उन्हें विवादित बना देता है या यूं कहे उन्हें विवादित होने का शौक है। कुल मिलाकर वो काफी शौकिन।

अपनी इच्छा को सीमाओं में बाधें रखियें।
वरना ये शौक गुनाहों में बदल जायेंगे॥


जसवन्त सिंह ने जिन्ना पर किताब लिखने की कब सोची होगी यह जानने के लिए थोड़ा फ्लैश-बैक में जाना होगा। हुआ यूं होगा कि जब जसवन्त अपने मसूद जैसे आतंकियो को कंधार छोड़ने गये तब रास्ते में टाईम-पास करने के लिए वो आतंकवादियों के साथ जिन्ना - जिन्ना खेलने लगे। ये तो आतंकियों का हृदय परिवर्तन न कर सके पर आतंकियो ने इनका हृदय अवश्य परिवर्तित कर दिया। जसवन्त आतंकवादी तो नहीं बने अलबत्ता मानव - बम जरुर बन गये। ये आत्मघाती बम स्वयं को नष्ट कर इतिहास के पन्नों में अवश्य चला गया। चुनाव में भाजपा का नारा था-महँगी पड़ी - काग्रेंस । लेकिन
बेचारे जसवन्त के लिए महँगी पड़ी- काफ्रेंस।

जिन्ना ने आजादी से पहले भारतीय जनता का नुकसान किया और आजादी के इतने बरस बाद भारतीय जनता पार्टी का एक बात तय है कि देश के विभाजन के लिए जिन्ना जिम्मेदार हो या न हो भाजपा के
विभाजन के लिए जरुर जिम्मेदार होगा।